खादी का कुर्ता, पैंट, चप्पल और कंधे पर एक झोला। आज से दशक- दो दशक पहले हम पत्रकार की कल्पना शायद इसी रूप में करते थे। लेकिन अब हमारा देश ग्लोबल हो चुका है। दुनिया बदल रही है और भारत भी कदम से कदम मिला कर आगे बढता जा रहा है। भारत में टेलीकाम, इनश्योरेंस और बैंकिंग कंपनियों की शुरुआत ने देश को नया रुप देने में काफी योगदान दिया, तो वहीं पत्रकारिता के रूप में भी काफी बदलाव आया है। मुझे याद है, अपने बचपन के दिनों मे मैं डीडी न्यूज के न्यूजरीडर्स को देखता था। हल्के रंग की साड़ी पहने गंभीर मुद्रा में गंभीर खबरों को पढती थी। लेकिन जैसे–जैसे खबरें बदलती गईं, खबरों को बताने वालों के स्वरूप में भी बदलाव आता गया।
अभी कुछ दिनों पहले की बात है। मै एक न्यूज चैनल देख रहा था जो देश के टाप-5 में गिना जाता है। एक महिला एंकर एक हालिया रिलीज फिल्म की विवेचना कर रहीं थीं। या यूं कहिए की चैनल और वो महिला पत्रकार उस फिल्म का प्रचार कर रहे थे। सब कुछ बड़ा ही नाटकीय था, क्योकि जिस फिल्म का वो प्रचार कर रहीं थी उसका मुख्य किरदार (Quick Gun Murugun) भी बड़ा नाटकीय है। उस किरदार का नाटकीय होना तो समझ आता है, लेकिन ना जाने उन महिला पत्रकार को क्या हुआ, वो भी बिल्कुल मुरूगन बनी हुईं थीं। हाथों में बंदूक, सर पे बड़ी सी गोल टोपी, रंगीन कपड़े और लंबा सा बूट पहने बिल्कुल मुरूगन लग रहीं थीं।
अचानक मेरे बगल में बैठा 13 साल का मेरा भांजा मुझसे कहता है, ‘मामा इस फिल्म के हीरो – हीरोइन बिल्कुल एक जैसे क्यों हैं?’ मैंने उसे समझाते हुए कहा, 'बेटा, ये हीरोइन नहीं है, ये तो पत्रकार हैं, जो इस न्यूज को हमें बता रहीं हैं।' उस बच्चे को तो मैंने समझा दिया लेकिन मैंने सोचा कि इस देश ने ऐसे भी पत्रकार देखे हैं जिन्होंने पूरी जिदंगी साड़ी पहन कर पत्रकारिता की, और आज एक बहुत बड़े मीडिया हाउस की मालकिन हैं। वहीं हमारे न्यूज चैनल (जहां मै पहले कार्यरत था) के कुछ सहयोगियों को देश के राष्ट्रपति का नाम बताने में तीन बार सोचना पड़ता है। चलिए, जो भी हो, बदलाव हमेशा ही अच्छा होता है, ऐसा मैं सोचता हूं, लेकिन हम इतने भी ना बदल जाएं कि दर्शक समझ ही ना पाएं कि जो लोग खबर बता रहें हैं वो हैं कौन?
Tuesday, September 22, 2009
मीडियानामा - जुगाड़
मीडियानामा - जुगाड़
आज की बदलती परिस्तिथयों में मीडिया की भुमिका कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। मंदी के दौर में जहाँ चारो ओर निराशा और अंधकार नजर आता है, मीडिया में उम्मीद की किरण दिखाई देती है। हर तरफ लोगो में बैचेनी है, ना जाने कल क्या होगा? लोग नाउम्मीद होते जा रहे हैं । क्या सच में ऐसी परिस्थिति आ गयी है, सबकुछ खतम हो गया है। नही मेरे भाई, निराशा में भी उम्मीद की किरण दिखती है बस अपना आत्मविश्वास बनाये रखने की जरूरत है। जब कभी मंदी आती है तो अपने साथ नए – नए अविष्कार भी लाती है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी अविष्कार हुए हैं सब मंदी के दौर में ही हुए हैं।
जब भी कोई मुसीबत आती है तो उसका हल भी होता है। इसका एक ताजा उदाहरण अभी हाल ही में देखने को मिला जब मीडिया ने एक समिति (Broadcasters Editors Association – BEA) गठित की, ताकि समस्याओं से निपटा जा सके। जब कभी भी मीडिया पर ऊंगली उठी है तो मीडिया के लोगो ने गंभीरता से इसपर विचार किया है और उसका हल निकाला है।
यहाँ मैं कुछ सवाल मैं उठाना चाहता हूँ जो कि मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश करने वालो के उपर केन्द्रित है।
लगभग हर छोटे – बडे मीडिया हाउस का अपना शिक्षण संस्थान है जिससे हर साल लाखों छात्र बाहर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए नौकरी की स्थिति इतनी भयावह क्यों है ?
मीडिया के बडे – बडे दिग्गज अक्सर पाँच सितारा होटलो की सभाओं में ये चिंता व्यक्त करते हैं कि मीडिया में जो नयी पीढी आ रही उनमें Talent का बडा अभाव है। सवाल ये है कि आखिर कहाँ से आते है ये Talent ?
के बदलते स्वरूप को लेकर काफी चर्चा होती है, अक्सर यही जबाब मिलता है कि समाज बदल रहा है, इसलिए खबर भी बदल गये है, अंतत: रिमोट आपके हाथों में ही है। तो मीडिया में घुसने की प्रक्रिया में हम बदलाव क्यों नहीं लाते ?
अगर इक्का दुक्का मीडिया हाउसों को छोड दिया जाए तो किन्ही के पास उनके
वेबसाइट में करियर का आप्सन नहीं है और अगर हैं भी तो उपयोगी नहीं है।
यह बडी ही चिंता का विषय है कि एक तरफ तो हम Professional बनने की बात करते है, वहीं दुसरी तरफ मीडिया में घुसने के लिए जुगाड़ की । एक नया युवा जब मीडिया की पढाई करके बडे धक्के खाकर हार जाता है, तब जाकर उसे अक्ल आती है कि भइया जुगाड़ । और फिर धीरे – धीरे वो भी समझने लगता है कि जुगाड़ ही सबसे बडा Talent है ।
आज की बदलती परिस्तिथयों में मीडिया की भुमिका कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। मंदी के दौर में जहाँ चारो ओर निराशा और अंधकार नजर आता है, मीडिया में उम्मीद की किरण दिखाई देती है। हर तरफ लोगो में बैचेनी है, ना जाने कल क्या होगा? लोग नाउम्मीद होते जा रहे हैं । क्या सच में ऐसी परिस्थिति आ गयी है, सबकुछ खतम हो गया है। नही मेरे भाई, निराशा में भी उम्मीद की किरण दिखती है बस अपना आत्मविश्वास बनाये रखने की जरूरत है। जब कभी मंदी आती है तो अपने साथ नए – नए अविष्कार भी लाती है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी अविष्कार हुए हैं सब मंदी के दौर में ही हुए हैं।
जब भी कोई मुसीबत आती है तो उसका हल भी होता है। इसका एक ताजा उदाहरण अभी हाल ही में देखने को मिला जब मीडिया ने एक समिति (Broadcasters Editors Association – BEA) गठित की, ताकि समस्याओं से निपटा जा सके। जब कभी भी मीडिया पर ऊंगली उठी है तो मीडिया के लोगो ने गंभीरता से इसपर विचार किया है और उसका हल निकाला है।
यहाँ मैं कुछ सवाल मैं उठाना चाहता हूँ जो कि मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश करने वालो के उपर केन्द्रित है।
लगभग हर छोटे – बडे मीडिया हाउस का अपना शिक्षण संस्थान है जिससे हर साल लाखों छात्र बाहर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए नौकरी की स्थिति इतनी भयावह क्यों है ?
मीडिया के बडे – बडे दिग्गज अक्सर पाँच सितारा होटलो की सभाओं में ये चिंता व्यक्त करते हैं कि मीडिया में जो नयी पीढी आ रही उनमें Talent का बडा अभाव है। सवाल ये है कि आखिर कहाँ से आते है ये Talent ?
के बदलते स्वरूप को लेकर काफी चर्चा होती है, अक्सर यही जबाब मिलता है कि समाज बदल रहा है, इसलिए खबर भी बदल गये है, अंतत: रिमोट आपके हाथों में ही है। तो मीडिया में घुसने की प्रक्रिया में हम बदलाव क्यों नहीं लाते ?
अगर इक्का दुक्का मीडिया हाउसों को छोड दिया जाए तो किन्ही के पास उनके
वेबसाइट में करियर का आप्सन नहीं है और अगर हैं भी तो उपयोगी नहीं है।
यह बडी ही चिंता का विषय है कि एक तरफ तो हम Professional बनने की बात करते है, वहीं दुसरी तरफ मीडिया में घुसने के लिए जुगाड़ की । एक नया युवा जब मीडिया की पढाई करके बडे धक्के खाकर हार जाता है, तब जाकर उसे अक्ल आती है कि भइया जुगाड़ । और फिर धीरे – धीरे वो भी समझने लगता है कि जुगाड़ ही सबसे बडा Talent है ।
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