मीडियानामा - जुगाड़
आज की बदलती परिस्तिथयों में मीडिया की भुमिका कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। मंदी के दौर में जहाँ चारो ओर निराशा और अंधकार नजर आता है, मीडिया में उम्मीद की किरण दिखाई देती है। हर तरफ लोगो में बैचेनी है, ना जाने कल क्या होगा? लोग नाउम्मीद होते जा रहे हैं । क्या सच में ऐसी परिस्थिति आ गयी है, सबकुछ खतम हो गया है। नही मेरे भाई, निराशा में भी उम्मीद की किरण दिखती है बस अपना आत्मविश्वास बनाये रखने की जरूरत है। जब कभी मंदी आती है तो अपने साथ नए – नए अविष्कार भी लाती है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी अविष्कार हुए हैं सब मंदी के दौर में ही हुए हैं।
जब भी कोई मुसीबत आती है तो उसका हल भी होता है। इसका एक ताजा उदाहरण अभी हाल ही में देखने को मिला जब मीडिया ने एक समिति (Broadcasters Editors Association – BEA) गठित की, ताकि समस्याओं से निपटा जा सके। जब कभी भी मीडिया पर ऊंगली उठी है तो मीडिया के लोगो ने गंभीरता से इसपर विचार किया है और उसका हल निकाला है।
यहाँ मैं कुछ सवाल मैं उठाना चाहता हूँ जो कि मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश करने वालो के उपर केन्द्रित है।
लगभग हर छोटे – बडे मीडिया हाउस का अपना शिक्षण संस्थान है जिससे हर साल लाखों छात्र बाहर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए नौकरी की स्थिति इतनी भयावह क्यों है ?
मीडिया के बडे – बडे दिग्गज अक्सर पाँच सितारा होटलो की सभाओं में ये चिंता व्यक्त करते हैं कि मीडिया में जो नयी पीढी आ रही उनमें Talent का बडा अभाव है। सवाल ये है कि आखिर कहाँ से आते है ये Talent ?
के बदलते स्वरूप को लेकर काफी चर्चा होती है, अक्सर यही जबाब मिलता है कि समाज बदल रहा है, इसलिए खबर भी बदल गये है, अंतत: रिमोट आपके हाथों में ही है। तो मीडिया में घुसने की प्रक्रिया में हम बदलाव क्यों नहीं लाते ?
अगर इक्का दुक्का मीडिया हाउसों को छोड दिया जाए तो किन्ही के पास उनके
वेबसाइट में करियर का आप्सन नहीं है और अगर हैं भी तो उपयोगी नहीं है।
यह बडी ही चिंता का विषय है कि एक तरफ तो हम Professional बनने की बात करते है, वहीं दुसरी तरफ मीडिया में घुसने के लिए जुगाड़ की । एक नया युवा जब मीडिया की पढाई करके बडे धक्के खाकर हार जाता है, तब जाकर उसे अक्ल आती है कि भइया जुगाड़ । और फिर धीरे – धीरे वो भी समझने लगता है कि जुगाड़ ही सबसे बडा Talent है ।
Tuesday, September 22, 2009
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